गुना। किसी ने सच ही कहा है कि "मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है।" इस उक्ति को गुना के प्रतिष्ठित उद्यमी रामप्रकाश ओझा ने अपने जीवन के संघर्ष और सफलता से चरितार्थ किया है। आज वे जिले में न केवल एक सफल व्यवसायी के रूप में पहचाने जाते हैं, बल्कि सादगी और सेवाभाव की एक मिसाल भी बन चुके हैं।
संस्कारों की नींव और संघर्ष का सफर
रामप्रकाश ओझा के व्यक्तित्व में जो विनम्रता और ईमानदारी झलकती है, उसकी नींव उनके माता-पिता कुसुम ओझा और रामसेवक ओझा के आदर्शों से बनी है। पारिवारिक संस्कारों को आत्मसात करते हुए उन्होंने बचपन से ही मेहनत को अपना मूलमंत्र बनाया। सन 2003 में जब उन्होंने फर्नीचर उद्योग की दुनिया में कदम रखा, तब चुनौतियां अपार थीं, लेकिन उनका इरादा अडिग था।
कारीगरी में झलकता विश्वास
आज दो दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद, फर्नीचर के क्षेत्र में उनका नाम गुणवत्ता और विश्वसनीयता का दूसरा नाम बन चुका है। उनके द्वारा तैयार किए गए काम में सिर्फ लकड़ी की फिनिशिंग ही नहीं, बल्कि उनके वर्षों का अनुभव और समर्पण भी स्पष्ट दिखाई देता है। यही कारण है कि ग्राहक उनके पास केवल सामान खरीदने नहीं, बल्कि एक अटूट विश्वास के साथ आते हैं।
रोजगार के सृजक: 'परहित सरिस धर्म नहिं भाई'
रामप्रकाश ओझा की सफलता का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि उन्होंने अकेले उन्नति करने के बजाय समाज को साथ लेकर चलने का संकल्प लिया। वर्तमान में उनके प्रतिष्ठान से 8–10 परिवार प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। उन्हें रोजगार उपलब्ध कराकर ओझा ने कई घरों के चूल्हे रोशन किए हैं। उनका मानना है कि वास्तविक प्रगति वही है, जिससे दूसरों का जीवन स्तर भी बेहतर हो सके।
प्रकृति और समाज के प्रति अटूट जुड़ाव
एक उद्यमी होने के साथ-साथ वे एक संवेदनशील पर्यावरण प्रेमी भी हैं। लकड़ी के साथ काम करने के बावजूद वे प्रकृति के संतुलन को बखूबी समझते हैं, इसलिए समय-समय पर पौधारोपण अभियानों के माध्यम से वे धरती को हरा-भरा बनाने का संदेश देते रहते हैं। इसके अलावा, सामाजिक कार्यों और जरूरतमंदों की सहायता के लिए वे सदैव तत्पर रहते हैं। ओझा समाज में उनकी छवि एक ऐसे प्रेरक व्यक्तित्व की है, जो अपनी व्यवहार कुशलता और नेतृत्व क्षमता से सबको साथ लेकर चलते हैं।
असाधारण व्यक्तित्व की साधारण कहानी
रामप्रकाश ओझा का जीवन यह सिखाता है कि जब नीयत साफ हो और कर्म ईमानदार, तो एक साधारण इंसान भी समाज के लिए असाधारण मिसाल बन सकता है। उन्होंने अपनी मेहनत से न केवल लकड़ी को तराशा, बल्कि अपनी तकदीर और समाज के प्रति अपने दायित्वों को भी खूबसूरती से आकार दिया है।