श्रीमती सरोज शुक्ला ऐसी महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं, जो विषम परिस्थितियों में स्वयं को असहाय, अबला और कमजोर समझती हैं। सरोज शुक्ला ने विषम परिस्थितियों को चुनौती दी है, यह साबित किया है कि आपकी उम्र हौंसलों पर भारी नहीं पड़ सकती है। मूलत: ग्वालियर की रहने वालीं सरोज शुक्ला का विवाह गुना निवासी स्व. जी.पी. शुक्ला से हुआ था। 64 वर्षीय श्रीमती सरोज शुक्ला ने अपने पति साथ मिलकर अपने बच्चों को शिक्षा दी और उन्हें काबिल बनाया। आज उनके दोनों बेटे उच्च पदों पर कार्य कर रहे हैं। इनके पिता श्री एस.एल. शुक्ला और माताजी श्रीमती सरस्वती शुक्ला का आभार व्यक्त करती हैं, जिन्होंने जीवन में संस्कार प्रदान किए और बी.ए. तक शिक्षित भी होने का अवसर प्रदान किया। इसकी वजह से बच्चों की परवरिश और जीवन में आगे बढ़ाना आसान हुआ। श्रीमती सरोज शुक्ला का परिचय दिया जाए तो इन्हें संस्कारित महिला, जिम्मेदार गृहिणी और सुख-दुख दोनों अवस्थाओं में साथ निभाने वाली पत्नि की संज्ञा दी जा सकती है। श्रीमती सरोज के पति जी.पी. शुक्ला 20 वर्षों तक बीमारी से ग्रसित रहे। सरोज शुक्ला ने एक पल के लिए भी हिम्मत नहीं हारी, हमेशा उनका उच्च उपचार करवाती रहीं, सेवा करतीं। यहां तक कि जब देशभर में कोरोना संक्रमण जैसी महामारी से लोग जूझ रहे थे और घर से बाहर निकलने में झिझक रहे थे। उस दौर में श्रीमती सरोज शुक्ला उनके पति जी.पी. शुक्ला को जी को लेकर दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल पहुंची थीं, जहां उनकी सेवा की और उपचार कराया। हालांकि नियति और ईश्वर की इच्छा के सामने उन्हें हार मारनी पड़ी और दुर्भाग्यवश जी.पी. शुक्लाजी अपने परिवार को छोड़कर प्रभु के चरणों में लीन हो गए। उनके स्वर्गवास के बाद सरोज शुक्ला के जीवन में खालीपन और अधूरापन तो आ गया, लेकिन जीवन जीने के दौरान सदमार्ग की प्रवृत्ति आज भी अपना रखी है। सरोज शुक्ला प्रयास करती हैं कि वह समाज में कुछ न कुछ योगदान निरंतर दे सके। इनके घर में सरोज शुक्ला ने अपने बच्चियों को आश्रय दिया और उनकी शिक्षा में सहयोग किया। कोई भी महिला परेशान हो, सरोज शुक्ला स्वयं की वृद्धावस्था भूलकर उनका सहयोग जरूरी करती हैं। वृद्ध आश्रम में निरंतर सहयोग देना और सामाजिक योगदान इनके व्यक्तित्व में शामिल है। बेहद धार्मिक प्रवृत्ति की सरोज शुक्ला जी निरंतर प्रभु की भक्ति में लीन रहती हैं। चातुर्मास के दौरान 4 माह तक भोजन नहीं किया और धार्मिक गतिविधियों में भी लीन रहीं। इनका स्वयं का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है। इसके बावजूद वृद्धावस्था में लोगों की मदद करना और उनका सहयोग करने की मंशा इन्होंने नहीं छोड़ी है। बेटियों की शिक्षा को अलग नजरिए से देखने वालीं सरोज शुक्ला कहती हैं कि बेटियां अगर शिक्षित होंगी तो अपने वह ससुराल, मायके दोनों में सामंजस्य स्थापित कर सकेंगी और दोनों ही परिवार सुखी रह सकते हैं। इसलिए अभिभावकों को अपनी बेटियों को शिक्षित ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षित बनाना चाहिए। बेटियां समाज का गौरव है, जिन्हें शिक्षित कर दिया जाए तो फिर वह अपना दायित्व भली-भांति निभाती हैं। यही समाज की आवश्यकता भी है।
सरोज शुक्ला: जीवन में संघर्ष को सामान्य बना देने वालीं महिला
